गुरु प्रदोष व्रत कथा
व्रत कथाशिव जी

गुरु प्रदोष व्रत कथा

✍️ Akhand Bhakti Sagar
गुरु प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक पवित्र व्रत है। पढ़ें गुरुवार प्रदोष व्रत की कथा, पूजा विधि, महत्व और भगवान शिव की आराधना से जुड़े नियम।
📿 गीत / बोल
ॐ नमः शिवाय।
हर हर महादेव। 🙏🔱
एक समय की बात है। देवराज इंद्र और भयंकर असुर वृत्रासुर की सेनाओं के बीच घोर युद्ध चल रहा था।
देवताओं ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर वृत्रासुर की सेना को पराजित कर दिया। अपनी सेना का विनाश देखकर वृत्रासुर अत्यंत क्रोधित हो उठा और स्वयं युद्धभूमि में उतर आया।
वृत्रासुर ने अपनी आसुरी शक्ति और माया से एक अत्यंत विशाल और भयंकर रूप धारण कर लिया। उसके विकराल रूप को देखकर देवता भयभीत हो गए।
सभी देवता देवराज इंद्र के साथ अपने गुरु देवगुरु बृहस्पति की शरण में पहुंचे।
देवताओं ने गुरु बृहस्पति से कहा—
"हे गुरुदेव! वृत्रासुर अत्यंत शक्तिशाली है। हम उसका सामना करने में असमर्थ हो रहे हैं। कृपया हमें उसका रहस्य बताइए और विजय का मार्ग दिखाइए।"
गुरु बृहस्पति ने कहा—
"हे इंद्र! वृत्रासुर कोई साधारण असुर नहीं है। वह अत्यंत तपस्वी और कर्मनिष्ठ है। उसने गंधमादन पर्वत पर कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था।"
फिर गुरु बृहस्पति ने वृत्रासुर के पूर्व जन्म की कथा सुनाई।
उन्होंने बताया कि पूर्व जन्म में वृत्रासुर चित्ररथ नाम का एक राजा था।
एक बार चित्ररथ अपने दिव्य विमान से कैलाश पर्वत पर पहुंचा। वहां उसने भगवान शिव को माता पार्वती के साथ विराजमान देखा।
चित्ररथ ने भगवान शिव और माता पार्वती के संबंध को देखकर उपहास करते हुए कहा—
"हे प्रभु! हम साधारण मनुष्य तो स्त्रियों के मोह में पड़ जाते हैं, लेकिन आपने भी माता पार्वती को अपने साथ इस प्रकार विराजमान किया हुआ है।"
चित्ररथ के इन वचनों को सुनकर भगवान शिव मुस्कुराए और बोले—
"हे राजन! मेरा मार्ग और मेरा स्वरूप साधारण मनुष्यों से अलग है। मैंने संसार की रक्षा के लिए कालकूट जैसे भयंकर विष को भी धारण किया है। फिर भी तुम मेरे स्वरूप का उपहास कर रहे हो।"
चित्ररथ की बातों से माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं।
माता पार्वती ने कहा—
"हे चित्ररथ! तुमने भगवान शिव जैसे सर्वव्यापी महेश्वर का और मेरा भी अपमान किया है। इसलिए मैं तुम्हें शाप देती हूं कि तुम दैत्य योनि को प्राप्त हो जाओ।"
माता पार्वती के श्राप के कारण चित्ररथ ने दैत्य योनि प्राप्त की और आगे चलकर वृत्रासुर के रूप में जन्म लिया।
लेकिन वृत्रासुर में एक विशेष बात थी।
वह दैत्य योनि में जन्म लेने के बाद भी भगवान शिव का भक्त था। उसने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था। इसी कारण उसे अत्यंत शक्तिशाली माना जाता था।
गुरु बृहस्पति ने देवराज इंद्र से कहा—
"हे इंद्र! वृत्रासुर भगवान शिव का भक्त है। इसलिए उसे पराजित करना सरल नहीं होगा। तुम भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत का पालन करो। विशेष रूप से बृहस्पतिवार को आने वाले प्रदोष व्रत का विधिपूर्वक अनुष्ठान करो।"
देवराज इंद्र ने अपने गुरु की आज्ञा स्वीकार की।
उन्होंने श्रद्धापूर्वक गुरु प्रदोष व्रत किया। प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन किया, शिवलिंग पर जल अर्पित किया, बेलपत्र चढ़ाए और भगवान शिव का ध्यान किया।
देवराज इंद्र ने भगवान शिव से प्रार्थना की—
"हे महादेव! मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरे अहंकार और सभी अपराधों को क्षमा करें। देवताओं की रक्षा करें और हमें धर्म की रक्षा करने की शक्ति प्रदान करें।"
देवराज इंद्र की भक्ति और प्रदोष व्रत से भगवान शिव प्रसन्न हुए।
भगवान शिव की कृपा से इंद्र को वृत्रासुर के विरुद्ध युद्ध में विजय प्राप्त हुई और देवताओं को पुनः शांति मिली।
इस प्रकार गुरु बृहस्पति के मार्गदर्शन में किए गए गुरु प्रदोष व्रत के प्रभाव से देवराज इंद्र को भगवान शिव की कृपा प्राप्त हुई।
कहा जाता है कि जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करता है, भगवान शिव उस पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।
इसलिए प्रदोष के दिन भक्तों को भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए, शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित करना चाहिए तथा "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करना चाहिए।
🙏 हे भगवान भोलेनाथ! अपने सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखें। उनके जीवन से दुख, संकट और भय दूर करें और उन्हें धर्म एवं सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।
बोलो उमापति महादेव की जय!
बोलो देवों के देव महादेव की जय!
हर हर महादेव! 🔱🙏

🔱 गुरु प्रदोष मंत्र

ॐ नमः शिवाय।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
हर हर महादेव! 🙏

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